श्री राम भक्त हनुमत् की महाकथा
कविता
छत्रपति संभाजीनगर
परम पूज्य अम्मा के श्री चरणों में सादर प्रणाम।

माँ, सुंदरकांड का पठन पाठन तो कई बार किया है, पर इसका गूढ़ार्थ तो आपकी कृपा के कारण ही समझ आया है। हनुमानजी भक्ति की पराकाष्ठा हैं। भक्ति का अर्थ है, समर्पण। भक्ति जीवन को सौंदर्य प्रदान करती है, अतः यह सोपान 'सुंदर' कांड है।

हनुमान जी भगवान के गुणों का विवेचन कर हमें निर्भरा भक्ति की ओर बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। भक्ति सभी इच्छाओं की पूर्ति का सशक्त साधन है। सुंदरकांड की, माँ, आपने जो विवेचना की है, उससे हमें यह समझ आता है कि हनुमान जी हमें प्रेरित कर रहे हैं कि षट् विकार और अहंकार इत्यादि का त्याग ही हमें भक्ति के मार्ग पर ले जा सकता है। बाधाओं पर बुद्धि और बल से विजय प्राप्त कर आगे बढ़ना चाहिए। ईर्ष्या आदि षट् विकारों पर विजय प्राप्त करने का एकमात्र साधन भगवद्जाप है।

धैर्य द्वारा असंभव कार्य भी संभव है। साधना का फल धैर्य धारण करने से ही प्राप्त होता है। विनम्रता - प्रभु की भक्ति के लिए आवश्यक गुण है। प्रभु - नाम का जाप कर उनके ध्यान में मग्न लोगों का संग भक्ति मार्ग को और भी प्रशस्त करता है। सत्संग द्वारा भक्ति की सहज ही प्राप्ति हो सकती है। अच्छे विचारों को शीघ्र ही कार्यान्वित करना चाहिए।
माँ, हम अपनी अज्ञानता के लिये क्षमायाची हैं | अपनी तुच्छ समझ से मैंने जो भी समझा, उसे आपके चरणों में समर्पित किया। क्षमा बड़न को चाहिए छोटन को उत्पात - इस युक्ति को मान कर क्षमा प्रार्थी।
हरि ॐ |