श्री सूतजी गद्दी
हरि ॐ!
गुरू परंपरा की कृपा प्रसाद के कारण ही मुझे गुरु माँ एवं श्री मनीष जी के साथ तीर्थयात्रा पर जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। संतों के साथ की गई तीर्थयात्रा का विशेष महत्व होता है। उनके सान्निध्य में दर्शन करना एक अनूठा और आत्मा को स्पर्श करने वाला अनुभव बन जाता है।
श्री सूत जी की गद्दी उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में नैमिषारण्य तीर्थ में स्थित एक अत्यंत पवित्र और ऐतिहासिक स्थान है। यह वह स्थान है जहाँ पौराणिक कथाओं के अनुसार, सूत जी महाराज ने शौनकादि ऋषियों को श्रीमद्भागवतम्, १८ पुराण और अन्य उपनिषद सुनाए थे। यह स्थान सनातन धर्म में ज्ञान के प्रसार का सबसे पुराना केंद्र माना जाता है।
स्कंद पुराण से उद्धृत श्री सत्यनारायण भगवान की कथा मैं वर्षों से पढ़ती आ रही हूँ ।श्री सूत जी महाराज के मंदिर में मुझे कथा की पहली पंक्ति याद आ गई,
सूत उवाच ---
“एकदा नैमिषारण्ये ऋषयः शौनकादयः ।
पप्रच्छुर्मुनयः सर्वे सूतं पौराणिकं खलु ॥ १॥“
यह पंक्ति इस पवित्र भूमि की महिमा का स्मरण कराती है। यहीं शौनक आदि ऋषियों ने सूत जी से प्रश्न किया था कि कलियुग से आक्रांत मनुष्य इस अंधकारमय संसार से कैसे पार हो सकता है? भक्ति, ज्ञान, विवेक और वैराग्य को कैसे विकसित किया जाए?
सूत जी महाराज ऋषियों के इन प्रश्नों से अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने बताया कि श्रीमद्भागवत कथा ही कलियुग के दुखों से मुक्त होने का एकमात्र सरल और श्रेष्ठ उपाय है। वैष्णव शब्द का महत्व बताते हुए माँ ने कहा हर भगवान का भक्त वैष्णव कहलाता हैं।
प्राचीन काल में यह मंदिर रेत और ईंटों से निर्मित था, परंतु आज भी इसकी सादगी और पवित्रता हमारे हृदय में गहन श्रद्धा जागृत करती है। मंदिर में बैठकर हमने सूत जी महाराज की प्रार्थना की और एक अद्भुत शांति का अनुभव किया।
प्रसाद ग्रहण करने के पश्चात हम सभी भक्तगण अगले दर्शन के लिए आगे बढ़े, हृदय में इस दिव्य अनुभूति को संजोए हुए।
माँ आपके चरणों में कोटि कोटि नमन।
